प्राचीन मथुरा की खोज-भाग एक

भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि मथुरा नगरी सच में तीन लोक से न्यारी है। आमजन इसकी कहानी को बस श्रीकृष्ण से जोड़कर ही जानते हैं जबकि यह नगरी अपने अतीत में एक विशाल वैभवशाली विरासत को सहेजे हुए है जो श्रीकृष्ण के जन्म से कहीं प्राचीन है। मथुरा की इस अनकही कहानी को लेकर आया है हिस्ट्रीपण्डितडॉटकॉम। यह विस्तृत आलेख लिखा है श्री लक्ष्मीनारायण तिवारी ने। श्री तिवारी ब्रज के इतिहास और संस्कृति के पुरोधा हैं जो अपने कुशल निर्देशन में ब्रज संस्कृति शोध संस्थान (वृन्दावन) का संचालन कर रहे हैं। यह आलेख थोड़ा विस्तृत है अतः इसे यहां किश्तों में प्रकाशित किया जा रहा है। प्रस्तुत आलेख प्राचीन मथुरा की खोज की पहली किश्त है।

प्राचीन मथुरा की खोज (पहली किश्त)

मथुरा, श्रीकृष्ण का जन्म स्थान। भारत के  महान प्राचीन नगरों में से एक। सप्त मोक्षदायिनी पुरियों में से एक। इस नगर के वैभव का वर्णन केवल हिन्दू ग्रंथों में ही नहीं वरन् बौद्ध एवं जैन साहित्य में भी मिलता है।

विश्वभर में पहचानी जाती हैं मथुरा शैली की मूर्तियां

पत्थर की मूर्तियों के निर्माण की विश्व प्रसिद्ध ‘मथुरा शैली’ यहीं की देन है। आज विश्व का शायद ही कोई प्रसिद्ध संग्रहालय हो, जहाँ मथुरा शैली की मूर्तियां सुशोभित न हों।मथुरा प्राचीन भारत के महत्वपूर्ण व्यापारिक राजमार्ग पर स्थित था। तब मध्य एशिया से सुदूर दक्षिण में समुद्र तट तक जाने वाला मार्ग यहाँ से होकर गुजरता था। प्राचीन भारत के ‘शूरसैन’ जनपद की राजधानी ‘मथुरा’ क्षेत्रफल की दृष्टि से एक विशाल नगर रहा होगा। क्यों कि प्राचीन भारत में आये यूनानी, चीनी एवं अरबी यात्रियों ने अपने यात्रा वृत्तों में इस नगर का आँखों देखा वैभव दर्ज किया है।

प्राचीन मथुरा नगर का विस्तार

जब हम मध्यकालीन मथुरा के नगर विस्तार को देखते हैं तो वह यमुना के किनारे-किनारे फैला अत्यंतछोटा एक हिन्दू तीर्थ नगर के रूप में दिखाई देता है जिस का प्रवेश द्वार ‘होली गेट’ था जिसे ब्रिटिश साम्राज्य में बनाया गया था। हम देख सकते हैं कि मध्यकाल से लेकर भारत की स्वतंत्रता से पूर्व तक मथुरा एक छोटा नगर ही था। यह निश्चित रूप से वह मथुरा नगर नहीं था जिसका वर्णन यूनानी,चीनी और अरबी यात्रियों ने किया है। यदि हम मध्यकालीन मथुरा नगर को देखें तो वह छोटे-बड़े अनेक टीलों पर बसा है। नगर के अन्दर और बाहर के क्षेत्रों में भी कई टीले स्थित हैं जिनमें से कई के नाम तो पौराणिक पात्रों के नामों पर हैं। जैसे  नारद टीला, ध्रुव टीला, सप्तऋषि टीला, नाग टीला, अम्बरीष टीला, गणेश टीला आदि। नगर के पास ही कंकाली टीला, कटरा, महाविद्या, सौंख, महोली आदि के टीले भी हैं। वास्तव में यह साधारण मिट्टी के टीले भर नहीं हैं। यह उस महान नगर के ध्वंसावशेष हैं जो एक विस्तृत क्षेत्रफल में फैला हुआ था और उस प्राचीन मथुरा नगर की वैभवशाली पुरातात्त्विक सम्पदा के खजाने हैं जिसे हज़ारों वर्ष पहले यूनानी, चीनी तथा अरबी यात्रियों ने अपनी आँखों से देखा था।

उत्खनन से उपजे साक्ष्य

प्राचीन मथुरा नगर जिसे भारत की सप्त मोक्षदायनी पुरियों में से एक माना गया है, उस का अभी तक सम्यक् रूप से पुरातात्विक उत्खनन कार्य नहीं हुआ है। मथुरा में जो भी उत्खनन कार्य हुआ, वह अलग-अलग समय पर, अलग-अलग स्थानों पर और अलग-अलग लोगों के निर्देशन में हुआ, जिन के उद्देश्य भी भिन्न-भिन्न थे। अब जब कि मथुरा ने एक आधुनिक नगर का रूप ले लिया है और नगर के अधिकांश पुरातात्विक स्थान व टीले आधुनिक कॉलोनियों में समा चुके हैं, ऐसे समय में यह कार्य और भी अधिक असंभव है। पर हम फिर भी उपलब्ध पुरातात्विक सामग्री के आलोक में प्राचीन मथुरा के इतिहास को समझने का प्रयास इस श्रृंखला के अन्तर्गत करेंगे। 

भरतपुर के किले का जवाहर बुर्ज

डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल का कथन 

लेकिन जब हम प्राचीन मथुरा की इस खोज यात्रा पर चल रहे हैं, तब मुझे बार-बार भारतीय संस्कृति के आचार्य परम श्रद्धेय डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल का पुण्य स्मरण आ रहा है। उन्होंने कभी मथुरा के लिए कहा था –

“मथुरा सचमुच महापुरी थी। प्राचीन परिभाषा के अनुसार महापुरी उसे कहते थे जो धर्मतीर्थ, अर्थतीर्थ, कामतीर्थ और मोक्षतीर्थ – इन चारों प्रकार के पुरुषार्थों का तीर्थ होती थी। राजनैतिक उत्थान और पतन समाप्त हो जाते हैं, किन्तु महापुरी का जीवन सततवाही रहता है। महापुरी का निर्माण राष्ट्र की सांस्कृतिक क्षमता का प्रमाण होता है। महापुरी मथुरा की विजयशालिनी कीर्ति चिरजीवी है। उसके इतिहास की रोचक कहानी आह्लाद से भरी हुई और ज्ञानवर्धक है।”

आचार्य डॉ० वासुदेवशरण अग्रवाल का यह कथन हमारी इस खोज यात्रा में हमारे आदर्श की तरह साथ रहेगा।

फोटो क्रेडिट : यह फोटो ब्रज संस्कृति शोध संस्थान वृन्दावन की डिजिटल लाइब्रेरी में संग्रहित है। मथुरा नगर का यह चित्र प्रसिद्ध अंग्रेज़ चित्रकार थॉमस डेनियल के द्वारा सन् 1796 ई० के लगभग बनाया गया था जिस में यमुना के किनारे – किनारे सिमटे हुए मध्यकालीन मथुरा नगर को देखा जा सकता है।

मानसी गंगा श्रीहरदेव, गिरवर की परक्कमा देव


श्री लक्ष्मीनारायण तिवारी, सचिव ब्रज संस्कृति शोध संस्थान, वृन्दावन

(आगे किश्तों में जारी)

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