भरतपुर के किले का जवाहर बुर्ज


भरतपुर के किले का नाम लोहागढ़ है। इस किले की बाहरी रक्षा दीवार पर आठ बुर्ज हैं। इन बुर्जों में सबसे अधिक प्रसिद्ध जवाहर बुर्ज है। इस बुर्ज का नामकरण महाराजा जवाहर सिंह के नाम पर किया गया है।

इस बुर्ज का नाम क्यों पड़ा जवाहर बुर्ज

भरतपुर किले में मौजूद राजा जवाहर सिंह का चित्र।



इस बुर्ज के नामकरण के पीछे एक कहानी है। महाराजा सूरजमल की मौत के बाद जवाहर सिंह राजा बने। सूरजमल की मौत स्वाभाविक नहीं थी। वे रणभूमि में शत्रुओं के हाथ शहीद हुए थे। जवाहर सिंह उनकी मृत्यु का बदला लेना चाहते थे। जिन परिस्थितियों में जवाहर सिंह राजा बने वे प्रतिकूल थीं।उनके भाई नाहर सिंह के समर्थक सरदार उनके भरोसे के नहीं थे। यही वजह थी कि जवाहर सिंह के हाथ तब तक राज्य का खजाना भी नहीं लगा था। उन दिनों जवाहर सिंह इस बुर्ज पर खड़े होकर दिल्ली पर हमले की योजनाएं बनाते रहते थे। जब उन्होंने दिल्ली पर हमला किया तब भी इसी बुर्ज से ही कूच किया था। यही वजह थी कि यह बुर्ज जवाहर बुर्ज कहलाता है।

बुर्ज पर बनी हुई हैं चार बारहद्वारी

जवाहर बुर्ज पर स्थित बारहद्वारी।



इस बुर्ज पर चार बारहद्वारी बनी हुई हैं। ये अब बहुत जीर्ण हो गईं हैं। एक तो इतनी जर्जर है कि उसे बांसों और रस्सियों से साध कर रखा गया है। ये सभी बारहद्वारी लाल पत्थर से बनी हैं। लोहागढ़ किले के अधिकांश भवन इसी लाल पत्थर से बने हैं। तीन बारहद्वारी एक मंजिल की हैं। इन बारहद्वारी के आंतरिक भागों पर सुंदर चित्रकारी की गई है। हालांकि अब यह चित्र बहुत खराब हो गए हैं। फिर भी इन्हें देखकर भरतपुर के राजाओं की कलाप्रियता का अंदाजा लगाया जा सकता है। 

बीस फुट लंबे पत्थर से बनी है छत

जवाहर बुर्ज पर मध्य में बनी बारहद्वारी।



बीच वाली बारहद्वारी पहली मंजिल पर बनी है। इसलिए यह थोड़ी ऊंची है। इस बारहद्वारी की छत में बीस फुट लम्बी पटिया लगी हैं। पत्थर के निर्माण में ऐसा बहुत कम ही देखने को मिलता है जब बहुत कम मोटाई वाली इतनी लंबी पटियां पटाव में लगीं हो वो भी बिना किसी गार्डर के।

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लोह स्तम्भ पर दर्ज है राजाओं की वंशावली

भरतपुर राज परिवार के नामों से अंकित लोह स्तम्भ।


बुर्ज के चौथे कौने पर एक बड़ा सा गोल चबूतरा है।इस चबूतरे की ऊंचाई आठ फुट है। इस चबूतरे के बीच में अठारह फुट ऊंचा और दो फुट गोलाई का एक लोह स्तम्भ है। इस स्तम्भ पर भरतपुर राज परिवार की सम्पूर्ण वंशावली दर्ज है। महाराज बदनसिंह के आदि पूर्वजों के नाम इसमें दर्ज हैं। उसके बाद के सभी शासकों का इसमें वर्णन है। सबसे अंत में इसमें आखरी शासक महाराज सवाई बृजेन्द्र सिंह का नाम यहां दर्ज है।

जवाहर बुर्ज को राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक दर्शाता बोर्ड।


यह स्थान भारत सरकार के पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की देख रेख में है। यह स्थान राष्ट्रीय संरक्षित स्मारकों की सूची में भी है।

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