बरसाना आएं तो परिक्रमा अवश्य लगाएं

ब्रज के धर्म स्थलों पर परिक्रमा का महत्व होता है। गोवर्धन की गिरिराज परिक्रमा तो बहुत प्रसिद्ध है। मथुरा, वृंदावन आदि स्थानों पर भी परिक्रमा होती है। बरसाना की जो परिक्रमा है वह गहवरवन परिक्रमा है। कहते हैं कि बरसाना की एक परिक्रमा गोवर्धन की सात परिक्रमा के समान फलदाई है।

करीब एक कोस की है यह परिक्रमा

सांकरी खोर में पहुंचने से पहले परिक्रमा मार्ग।


बरसाना की परिक्रमा से यहां के अधिकांश मंदिरों के दर्शन होते हैं। परिक्रमा जहां से शुरू होती है वहीं पर समाप्त होती है। ज्यादातर भक्त यह परिक्रमा मुख्य बाजार से शुरू करते हैं। बाजार से थाना मार्ग पर यह परिक्रमा आगे बढ़ती है। थाना पहुंचने के बाद रास्ता सांकरी खोर की तरफ जाता है। यहां शीतला माता का मन्दिर स्थित है। यह मन्दिर परिक्रमा के बायीं ओर है। यहां भक्तजन दर्शन करते हैं। 

राधा की नगरी में करें राम के दर्शन

राम मंदिर सांकरी खोर।



यहां एक घाटी है जिसके बायीं तरफ विलासगढ़ की पहाड़ी है। दायीं तरफ कुशल बिहारी मंदिर है। यहां दायीं ओर बड़े बड़े रेतीले टीले हैं। दरअसल यह समूचा बरसाना नगर रेतीले टीलों पर ही बसा हुआ है। यहां के गलियों में हो उतार चढ़ाव दिखता है उसकी वजह उनके नीचे दबे रेत के टीले ही हैं। थोड़ा आगे बढ़ने पर दायीं ओर के रेतीले टीलों से आगे राम मंदिर स्थित है। राम मंदिर के दर्शन कर आगे बढ़ने पर सांकरी खोर आती है। 

यहां पर होती हैं मटकी फोड़ लीला

ये है सांकरी खोर। जहां एक बार मे एक ही व्यक्ति निकल पाता है।

यह सांकरी खोर एक तंग घाटी है। इसके बायीं तरफ विलासगढ़ की पहाड़ी है और दायीं तरफ मोरकुटी की पहाड़ी। इन पहाड़ियों पर मन्दिर बने हुए हैं। ये जो सांकरी खोर है यह मटकी लीला का स्थान है। कहते हैं द्वापर में श्रीकृष्ण ने इस स्थान पर गोपियों की दही से भरी मटकी यहां तोड़ी थी। हर वर्ष भादों के महीने में यहां मटकी फोड़ लीला आयोजित होती है। इन दोनों पहाड़ियों पर रास मंडप बने हुए हैं। रासलीला के दौरान यहां राधा-कृष्ण के स्वरूप विराजते हैं। 

राधा सरोवर और गहवरवन को करें प्रणाम

गहवर वन का राधा सरोवर।



यहां से आगे परिक्रमा चिकसोली गांव में पहुंचती है। यह राधा रानी की सहेली चित्रा सखी का गांव है।चिकसोली की गलियों से आगे गहवरवन स्थित है। यहां राधा रस मन्दिर और राधा सरोवर दर्शनीय हैं। यहां से मोरकुटी और मान मन्दिर के शिखरों तक जाने के रास्ते हैं। राधा सरोवर बहुत गहरा है। परिक्रमा करने वाले श्रद्धालु इसके दर्शन अवश्य करते हैं। लोग इसे गहवर कुंड भी कहते हैं। मोरकुटी की पहाड़ी और मान मन्दिर की पहाड़ी के बीच की तंग घाटी में जो वृक्षावली है यही गहवरवन है। 

गहवरवन में बंदरों से रहें सावधान

महाप्रभु जी की बैठक के सामने परिक्रमा मार्ग।



यहां से परिक्रमा वापसी की दिशा में मुड़ती है। आगे चलने पर महाप्रभु बल्लभाचार्य जी की बैठक स्थित है। यहां दोनों तरफ ऊंची ऊंची पहाड़ियां दिखती हैं। इस क्षेत्र में बन्दर भी बड़ी संख्या में मिलते हैं। यहां श्रद्धालुओं को बंदरो से सावधान रहना पड़ता है। बहुत से श्रद्धालु इन बंदरों को खिलाने के लिए फल लेकर आते हैं। 

ऊंचे पर्वत पर गहरा कुंआ ‘आश्चर्य’

जयपुर मन्दिर से पहले परिक्रमा मार्ग।



आगे दायीं तरफ एक रास मंडल स्थित है। यह बहुत प्राचीन है। यहां प्रतिदिन रास लीला होती है। यहां एक कुंआ भी है जो बहुत गहरा है। 
इसके आगे चलकर बायीं तरफ बहुत से संतों की समाधियां दिखती हैं। दायीं  तरफ दानगढ़ मन्दिर हैं। यहां भक्तजन दान बिहारी के दर्शन करते हैं। इस मंदिर के आगे एक पत्थर का बना प्राचीन झूला स्थित है। 

कुशल बिहारी मंदिर है भव्य

कुशल बिहारी मंदिर।



यहां से आगे कुशल बिहारी मंदिर पड़ता है। कुशल बिहारी मंदिर राजस्थान सरकार का मन्दिर है। गाड़ियों से आने का रास्ता भी यहां तक आता है। यहां पार्किंग और केंटीन की सुविधा उपलब्ध है। यहां से आगे का रास्ता लाड़लीजी के मन्दिर की ओर जाता है। यहां परिक्रमा मार्ग अपेक्षाकृत चौड़ा है। उद्यान विभाग की देख रेख की वजह से यहां हरियाली भी बनी हुई है। थोड़ा आगे चलकर दायीं तरफ स्वामी जी का स्थान है। 

स्वामी को प्रणाम अवश्य करें

स्वामीजी के दर्शन।



स्वामी जी लाड़लीजी मन्दिर के गोस्वामीजनों के पूर्वज हैं। इनका पूरा नाम नारायण दास स्वामी जी था। ये नारायण भट्टजी के शिष्य थे। भट्टजी ने लाड़लीजी की प्रतिमा का प्राकट्य किया था। उन्होंने बाद में लाड़लीजी मन्दिर की सेवा का दायित्व स्वामीजी को सौंप दिया था। पिछले करीब पांच सौ वर्ष से स्वामीजी के वंशज गोस्वामीजन ही लाड़लीजी की सेवा करते आ रहे हैं।

यहां विराजती हैं वृषभानु की दुलारी

लाड़लीजी मन्दिर, बरसाना।



आगे चलकर हम पहुंचते हैं लाड़लीजी मन्दिर। यह मुख्य मंदिर है। यहां दर्शन के उपरांत मन्दिर के पीछे से होते हुए सिंघपौर तक जाते हैं। सिंघपौर पर गोमाता का मन्दिर है। यहां बगल में ही श्री राधाजी के चरण चिन्ह के भी दर्शन हैं। यहीं ब्रह्मा जी का भी मन्दिर है। 

नीचे उतरने के लिए हैं सीढियां

सिंघपौर से नीचे उतरने के लिए सीढियां।



सिंघपौर से नीचे उतरने के लिए सीढियां हैं। यहां से नीचे तक करीब 180 सीढियां है। इनसे नीचे आते समय रास्ते में कई दर्शनीय स्थल हैं। थोड़ा नीचे आने पर हनुमानजी का मन्दिर है। यहीं पर नागाजी की कुटी भी है। 

राधा रानी के दादी-बाबा का प्राचीन मंदिर

राधाजी के दादी बाबा का मन्दिर।



और नीचे आने पर राधाजी के दादी-बाबा का मन्दिर है। यहां से सीढियां दो भागों में बंट जाती हैं। दायीं और कि सीढियां रंगीली गली में जाती हैं। बायीं तरफ की सीढ़ियां सुदामा चौक की तरफ जाती हैं। परिक्रमार्थियों को सुदामा चौक की तरफ जाना चाहिए। इन सीढ़ियों पर आगे साक्षी गोपाल मंदिर, दाऊजी मन्दिर आदि स्थान दर्शनीय हैं। 

और आप पहुँच गए सुदामा चौक

सुदामा चौक पहुंचकर समाप्त होती हैं सीढियां।



नीचे पहुंचने पर सुदामा चौक है। यहां एक प्राचीन कुआं दर्शनीय है। यहां सुदामा जी का मन्दिर बना है। यहीं पर पथवारी देवी का मन्दिर भी है। थोड़ा आगे वृषभानु जी मन्दिर और अष्टसखी मन्दिर पड़ते हैं। इनसे आगे बाजार की और चलकर लड़ैती लाल मन्दिर है। इसके आगे चलने पर रंगीली गली चौक, गंगा मन्दिर, गोपाल जी मन्दिर और श्यामा श्याम मन्दिर के दर्शन करते हुए श्रद्धालु मुख्य बाजार में पहुंचते हैं। यह वही स्थान है जहां से परिक्रमा शुरू की थी। 

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