दो खामोश आंखें – 21 Posted on 2nd February 2011 by Yogendra Singh Chhonkar योगेन्द्र सिंह छोंकर कभी भटकाती कभी राह दिखाती कभी छिप जाती कभी आकर सामने अपनी ओर बुलाती मुझसे है खेलती या मुझे खिलाती दो खामोश ऑंखें
साहित्य तर्पण (जीते जी भर पेट खाने को तरसती मां के मृत्यु भोज में किया लाखों का खर्चा) Yogendra Singh Chhonkar 8th October 2023 0 कहानी पायल कटियार आज दादी का श्राद्ध है कहते हुए सुबह से ही उसकी मां ने घर के सभी सदस्यों को जल्दी उठा दिया। श्राद्ध […]
साहित्य श्री दुर्गा चालीसा Yogendra Singh Chhonkar 28th April 2020 0 नमो नमो दुर्गे सुख करनी। नमो नमो अंबे दुःख हरनी॥ निरंकार है ज्योति तुम्हारी। तिहूं लोक फैली उजियारी॥ शशि ललाट मुख महाविशाला। नेत्र लाल भृकुटि […]
साहित्य ब्रज की वर्त्तमान आतंरिक गतिकी – एक बाहरी अध्येता के नोट्स Yogendra Singh Chhonkar 21st August 2023 0 अमनदीप वशिष्ठ ब्रज में पिछले कुछ समय से एक संश्लिष्ट वैचारिक मंथन चल रहा है। इस वैचारिक मंथन का स्वरूप बहुत से कारकों से मिलकर […]