दो खामोश आंखें – 20 Posted on 2nd February 2011 by Yogendra Singh Chhonkar योगेन्द्र सिंह छोंकर जी जाऊं पी विसमता विष रस समता बरसाऊँ रहे सदा से रोते जो उनको जाय हसाऊँ जो एक बार फिर से देख पाऊँ दो खामोश ऑंखें
साहित्य सत्संग का सही अर्थ Yogendra Singh Chhonkar 24th June 2023 0 कहानी पायल कटियार सुनो मुझे कल सत्संग में जाना है। नेहा ने अपने परिवार के सभी सदस्यों को सचेत करते हुए कहा। नेहा नियम से […]
साहित्य ब्रज की वर्त्तमान आतंरिक गतिकी – एक बाहरी अध्येता के नोट्स Yogendra Singh Chhonkar 21st August 2023 0 अमनदीप वशिष्ठ ब्रज में पिछले कुछ समय से एक संश्लिष्ट वैचारिक मंथन चल रहा है। इस वैचारिक मंथन का स्वरूप बहुत से कारकों से मिलकर […]
साहित्य दो खामोश आंखें पीठ में सुराख किये जाती हैं Yogendra Singh Chhonkar 4th March 2011 1 योगेन्द्र सिंह छोंकर दो खामोश ऑंखें मेरी पीठ में सुराख़ किए जाती हैं! माना इश्क है खुदा क्यों मुझ काफ़िर को पाक किए जाती हैं! भागता हूँ […]