किस्सा सात चौक की हवेली और बक्शी मोहनराम बरसानियाँ का -1

पहली किश्त

बरसाना का राजनैतिक इतिहास यहां के आध्यात्मिक इतिहास के पीछे कहीं छिप कर रह गया है। अठारहवीं शताब्दी में अचानक समृद्ध हुआ बरसाना नगर जाट शासन के दौरान जिला सदर मुकाम बन गया था। उस दौर में यहां बहुत से बड़े निर्माण कार्य हुए। इन निर्माण कार्यों से बरसाना के सौंदर्य को चार चांद लग गए थे। हालांकि उसी दौर में हुए बरसाना के युद्ध ने यहां की उन सुंदर हवेलियों को बर्बाद कर के रख दिया था फिर भी आज भग्नावस्था में खड़ी ये हवेलियां अपने पीछे छुपी दास्तान को कहतीं हैं। हिस्ट्रीपण्डित डॉटकॉम आपके लिए लेकर आया है बरसाना की हवेलियों की यही अनकही कहानी। आज की कहानी है बरसाना की सात चौक की हवेली की। इस विशाल हवेली के पीछे एक महान योद्धा का साहस और दुर्भाग्य छिपा हुआ है।         

सात चौक की हवेली का निर्माता मोहनराम बरसानियाँ

जाट राज्य पर आधिपत्य के लिए बदन सिंह को राव चूड़ामन और उसके बाद उसके पुत्रों के साथ जाट राज्य का नायक बनने के लिए संघर्ष करना पड़ा था। इस संघर्ष के दौर में बहुतेरे प्रभावशाली लोगों ने बदन सिंह का साथ दिया था। हेमराज कटारा, श्रीलालजी (टांटिया ठाकुर) और कालूराम पुरोहित बरसाना के ऐसे ही लोग थे जो बदन सिंह का राज्य खड़ा करवाने में उसके सहायक साबित हुए। इनमें से जो कालूराम पुरोहित थे वे वशिष्ठ ब्राह्मण थे। इनके छह पुत्र हुए। मोहनराम, नैनसुख, हरसुख, मयाराम, गिरधारी और ठाकुरसी। बदन सिंह के पुत्र सूरजमल ने कालूराम के लड़कों को अपनी फौज में शामिल कर लिया। इन लोगों को फौजदार, बक्शी (सेना नायक) और सरदार-राज जैसे बड़े पद दिए गए।  

मोहनराम बन गया मुख्य सेनापति  

मोहनराम अत्यंत वीर था उसने कई युद्धों में अपने साहस का प्रदर्शन किया। वह तरक्की करते हुए सेना और तोपखाने के सर्वोच्च पदों तक पहुंचा। 1758 में जब सूरजमल के पुत्र जवाहर सिंह ने विद्रोह किया था तब मोहनराम ने उस विद्रोह को कुचलने में सूरजमल का साथ दिया था। तब से जवाहर सिंह मोहनराम का शत्रु हो गया। उस संघर्ष के बाद जवाहर सिंह अपने पिता सूरजमल की मौत के बाद ही वापस लौटा। और उसने मोहनराम को दंडित करने की साजिश रची। साजिश की बात आगे अभी कुछ मोहनराम के बारे में…।  

मोहनराम बरसानियाँ के सैन्य अभियान

मोहनराम को भरतपुर में मोहनराम लवानियां और मोहनराम बरसानियाँ के नाम से जाना जाता है। मोहनराम की जाट राज्य में पकड़ का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जब 12 जून 1761 को सूरजमल ने आगरा के किले को जीता तब इस महान किले की किलेदारी का प्रबंध भी बक्शी मोहनराम के परिवार के लोगों को ही सौंपा। भदावर और दोआब पर अभियान के लिए सूरजमल ने अपने पुत्र नाहर सिंह को मोहनराम के साथ ही भेजा। दिसम्बर 1763 में नजीब पर चढ़ाई करने के सूरजमल के दिल्ली अभियान में मोहनराम उसके साथ था।  

(आगे किश्तों में जारी)

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