आर्यन पेशवा राजा महेंद्र प्रताप

द्वितीय विश्वयुद्ध में अंग्रेजों को घिरा हुआ देखकर उस परिस्थिति का लाभ उठाकर भारत को स्वतंत्र कराने का स्वप्न नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने देखा था। ठीक इसी तरह पहले विश्वयुद्ध की परिस्थितियों का लाभ उठाकर भारत को आजादी दिलाने का स्वप्न की एक देशभक्त द्वारा देखा गया। इसके लिए उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा विदेशों में निर्वासित रहकर बिताना पड़ा। एक राजा के घर में जन्मे इस व्यक्ति का नाम था महेंद्र प्रताप जिन्हें लोग आर्यन पेशवा भी कहते हैं। 

कौन थे राजा महेंद्र प्रताप



महेंद्र प्रताप अलीगढ़ जिले की मुरसान रियासत के राजपरिवार में जन्मे थे। इनका जन्म एक दिसंबर 1886 को मुरसान में हुआ था। जब ये ढाई वर्ष के हुए तब हाथरस के राजा हरनारायण सिंह ने इन्हें गोद ले लिया। जब ये सात वर्ष के हुए तब इनके दत्तक पिता की मौत हो गई। इनकी शिक्षा गवर्नमेंट स्कूल अलीगढ़ में हुई। इन्होंने एमएओ कॉलेज अलीगढ़ में बीए प्रथम वर्ष तक की पढ़ाई की। इनका विवाह जींद के रणवीर सिंह की बहन बलवीर कौर के साथ हुआ। 

शिक्षा के क्षेत्र में जगाई अलख

वृंदावन के प्रेम महाविद्यालय में स्थित राजा साहब की प्रतिमा।



राजा महेंद्र प्रताप ने शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया। उन्होंने मई 1909 में वृन्दावन में प्रेम महाविद्यालय की स्थापना की। इस महाविद्यालय के संचालन के लिए उन्होंने अपनी आधी रियासत इसके नाम कर दी। उस आधी रियासत से 33 हजार रुपए वार्षिक की आमदनी थी। उन्होंने अलीगढ़ के डीएवी कॉलेज और कायस्थ पाठशाला के लिए भूमि दान की। उन्होंने बुलन्दशहर में अनेक संस्थाओं को दान दिया। हिन्दू विश्वविद्यालय काशी को भी दान दिया। राजा महेंद्र प्रताप ने किसानों की सहायता के लिए मथुरा के कलेक्टर को दस हजार रुपए दान दिए। उन्होंने मथुरा में अपने जमींदारी के गांवों 25 हजार रुपए खर्च कर प्रारंभिक पाठशालाएं खुलवायीं। 

पण्डों के विरोध के बावजूद गुरुकुल को दान की जमीन



पहले संयुक्त आर्य प्रतिनिधि सभा का गुरुकुल फर्रूखाबाद में होता था। संस्था ने इस गुरुकुल को वृन्दावन लाने का निर्णय किया। इस गुरुकुल के निर्माण के लिए राजा साहब ने 15 हजार रुपए कीमत की भूमि संयुक्त आर्य प्रतिनिधि सभा की दान की। उनके इस कदम का वृन्दावन के पण्डे-पुजारियों ने बड़ा विरोध किया था। 

राजा महेंद्र प्रताप द्वारा शुरू करवाई पत्र-पत्रिकाएं



राजा साहब प्रगतिशील सोच के धनी थे। उन्होंने अप्रैल 1912 में वृंदावन से एक पत्र शुरू किया। इस पत्र का नाम प्रेम था। इस पत्र के माध्यम से उन्होंने धार्मिक कुरीतियों पर चोट की। इस वजह से उन्हें वृन्दावन के लोगों का विरोध सहना पड़ा। उन्होंने देहरादून से निर्बल सेवक नामक एक समाचार पत्र निकाला। इस पत्र में उन्होंने जर्मनी के पक्ष में एक लेख प्रकाशित कर दिया। इस लेख के कारण उन पर सरकार ने 500 रुपये जुर्माना लगाया था।

विदेश यात्रा और आजादी के प्रयास



सन 1914 में पहला विश्व युद्ध शुरू हुआ। इस युद्ध की परिस्थितियों का लाभ उठाकर राजा साहब ने देश को आजाद कराने का निश्चय किया। दिसम्बर 1914 में राजा साहब ने वृन्दावन से प्रस्थान किया। उनके साथ उनके निजी सचिव ब्रह्मचारी हरिश्चंद्र भी साथ थे। राजा साहब की यह विदेश यात्रा बिना पासपोर्ट के थी। राजा साहब जर्मनी पहुंचे और वहां के शासक कैसर से भेंट की। जिसने उन्हें हर सम्भव मदद का वचन दिया। वहां से वे अफगानिस्तान गए। बुडापेस्ट, टर्की होकर हैरत पहुंचे। फिर से वे अफगानिस्तान गए। अफगान शाह से मुलाकात की। दिसम्बर 1915 में काबुल स उन्होंने भारत के लिए अस्थायी सरकार की घोषणा की। इस सरकार के राष्ट्रपति वे स्वयं थे। अफगानिस्तान और अंग्रेजों के मध्य युद्ध छिड़ गया। राजा साहब ने रूस जाकर लेनिन से भी भेंट की थी। लेकिन लेनिन से उन्हें कोई सहायता नहीं मिल पाई। 

अंग्रेजों ने जब्त की रियासत



राजा साहब के विदेश भ्रमण के दौरान लंबे समय तक उनकी कोई खोज खबर नहीं मिली। बाद में एक अखबार में उनका लेख छपा तो देशवासियों को उनकी कुशलता की खबर हुई। उनकी सरकार विरोधी गतिविधियों को देखकर अंग्रेजों ने उनकी रियासत को जब्त कर लिया। उधर राजा साहब 1920 से 1946 तक विदेशों में भ्रमण कर देश की आजादी के लिए अलख जगाते रहे। उनके वृन्दावन स्थित प्रेम महाविद्यालय भी क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र रहा।

राजा साहब की भारत वापसी


वृंदावन के केशी घाट पर स्थित राजा महेंद्र प्रताप की समाधि।


राजा साहब लंबे समय तक निर्वासित जीवन बिताने के बाद 1946 में भारत लौटे। 1957 के आम चुनाव में वे मथुरा लोकसभा क्षेत्र से निर्दलीय चुनाव लड़े। इस चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के चौधरी दिगम्बर सिंह को हराया। इस चुनाव में जनसंघ के बड़े नेता अटल बिहारी वाजपेयी भी लड़े थे। वाजपेयी जी इस चुनाव में चौथे स्थान पर रहे थे। राजा साहब की मृत्य अप्रैल 1979 को हुई। वृंदावन के केशी घाट पर उनकी समाधि बनी हुई है।

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