श्रीकृष्ण के कर्मयोग की प्रेम प्रेरणा हैं श्रीराधा

विवेक दत्त मथुरिया

राधाकृष्ण का अलौकिक प्रेम लौकिक जगत के प्राणियों के लिए सुदूर अतीत से लेकर आज तक कौतूहल का विषय है। अगर राधा तत्व की बात की जाए तो इसे लेकर श्रीमद्भागवत भी मौन है। कहा जाता है कि सुकदेव जी ने जब भी राधा तत्व को भावाभिव्यक्ति देने का प्रयास किया तो ‘रा’ के उच्चारण के साथ समाधि लग जाती थी। इसलिए श्रीमद्भागवत में राधा तत्व एक गोपी के रूप में गोपनीय और मौन है। श्रीकृष्ण ने तो श्रीराधा महाभाव को लोक कल्याणार्थ निष्काम कर्मयोग के रूप में जीया है। तब प्रेम के इस महाभाव की स्थिति को समझना कामनाओं से युक्त मानव मन के लिए कितना दुरूह है?
राधा तत्व की जो भाव स्थिति हम पढ़ते सुनते हैं वह भक्त और कवियों की अपनी भाव अभिव्यक्ति है। श्रीमद्भागवत में गोपनीय तत्व के रूप में राधा भाव विद्वानों की व्याख्या के अनुसार सुनने को मिलता है। वैष्णव सम्प्रदायों में भी राधा तत्व को लेकर अपने अलग अलग सिद्धांत हैं।
जैसा कि सनातन मान्यता है कि श्रीराधा श्रीकृष्ण की प्रणाल्हादिनी शक्ति हैं। एम संवेदनशील मन के लिए प्रेम प्राण के सदृश्य ही होता है। उसे प्रेमी के अस्तित्व से अलग करके नहीं देखा जा सकता है।
राधाकृष्ण स्नेही एक प्राण दो देही।
प्रेम आराधना एक ऐसी योग शक्ति है जो ‘मैं’ और ‘तू’ को मिटाकर हम बनाती है। आत्मा से परमात्मा के मिलन का योग अन्य साधन साधनाओं के मुकाबले ज्यादा सहज योग है, पर ऐसा प्रेम भी दुरूह है।
श्रीकृष्ण की प्रेम आराधना ब्रज की एक गोपी को राधा के रूप में स्थापित करती है। श्रीकृष्ण ने प्रेम की श्रेष्ठता के वशीभूत श्रीराधा को ब्रज की अधिष्ठात्री के रूप में स्थान देकर नारी सशक्तिकरण की जो मिशाल पेश की है, वह अपने में विलक्षण, अनुपम, अतुलनीय है, ऐसा प्रमाण कहीं नहीं मिलता।
प्रेम की प्रेरणा और उससे प्राप्त शक्ति विलक्षण होती है। राधा की प्रेम प्रेरणा ही श्रीकृष्ण के लिए कर्मयोग की दीक्षा बनी। ब्रज में गाय चराने वाला एक ग्वाला राधा की प्रेम प्रेरणा शक्ति से दुनिया के सामने श्रीकृष्ण के रूप में दर्शन देता है। राधाकृष्ण का प्रेम बलिदान और विरह की सर्वोच्चता को स्थापित करता है। राधा को ब्रज में छोड़कर उनके लोककल्याण हेतु कर्मयोग की स्थापना के लिए ताजिंदगी संघर्ष किया और वह भी मुस्कराते हुए। आज राधाकृष्ण भक्ति के कर्मकांड में यह मूल संदेश पीछे छूटा नजर आता है। राधाकृष्ण की भक्ति जगत कल्याण से दूर स्वान्तः सुखाय का साधन बन गया है।

विवेक दत्त मथुरिया

( हिस्ट्रीपण्डित डॉटकॉम के लिए यह आर्टिकल विवेक दत्त मथुरिया ने लिखा है। विवेक वरिष्ठ पत्रकार हैं और मथुरा में रहते हैं। विवेक विभिन्न मीडिया संस्थानों में सेवाएं दे चुके हैं)

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