मजदूर के लिए 1 Posted on 5th March 20113rd March 2019 by Yogendra Singh Chhonkar योगेन्द्र सिंह छोंकर लाल किला है लाल लहू से मेरे ताज महल का संगेमरमर मेरे पसीने से चिपका है
साहित्य दो खामोश आंखें पीठ में सुराख किये जाती हैं Yogendra Singh Chhonkar 4th March 2011 1 योगेन्द्र सिंह छोंकर दो खामोश ऑंखें मेरी पीठ में सुराख़ किए जाती हैं! माना इश्क है खुदा क्यों मुझ काफ़िर को पाक किए जाती हैं! भागता हूँ […]
साहित्य दो खामोश आंखें – 9 Yogendra Singh Chhonkar 28th January 2011 0 योगेन्द्र सिंह छोंकर जो बेखुदी न दे पाया तेरा मयखाना साकी दे गईं दो खामोश ऑंखें
साहित्य दो खामोश आंखें – 15 Yogendra Singh Chhonkar 2nd February 2011 0 योगेन्द्र सिंह छोंकर कितना आसाँ था जिनके लिए मुझे हँसाना, रुलाना, मानना मनमर्जी चलाना क्या उतनी ही आसानी से मुझे भुला भी पाएंगी दो खामोश ऑंखें