दो ख़ामोश आंखें -24 Posted on 2nd February 2011 by Yogendra Singh Chhonkar योगेन्द्र सिंह छोंकर महबूबा की, मजलूम की, कवि की, किसान की, इंसान की भगवान की सबकी हैं दो खामोश ऑंखें
साहित्य दो खामोश आंखें – 26 Yogendra Singh Chhonkar 2nd February 2011 0 योगेन्द्र सिंह छोंकर ऊपर से एक वचन नीचे से बहु वचन बताती हैं पैजामे को पर देख लहंगे को पशोपेश में पड़ जाती हैं दो […]
साहित्य दो खामोश आंखें – 31 Yogendra Singh Chhonkar 4th March 2011 0 योगेन्द्र सिंह छोंकर मंदिर हो या कोई मजार किसी नदी का पुल हो, कटोरा किसी भिखारी का या शाहजहाँ की कब्र एक ही भाव सिक्का फैंकती है […]
साहित्य श्री दुर्गा चालीसा Yogendra Singh Chhonkar 28th April 2020 0 नमो नमो दुर्गे सुख करनी। नमो नमो अंबे दुःख हरनी॥ निरंकार है ज्योति तुम्हारी। तिहूं लोक फैली उजियारी॥ शशि ललाट मुख महाविशाला। नेत्र लाल भृकुटि […]