अवध के नवाब की पथैना में पराजय

स्थान और समय

यह किस्सा 1777 ईस्वी का ऋतु बसन्त की रही होगी। अंग्रेजी महीनों में हिसाब लगाएं तो फरवरी-मार्च का समय था। जगह है वैर के पास पथैना गांव।

प्रमुख पात्र

इस किस्से को समझने से पहले चार नाम याद रख लें पहला मिर्जा नजफ़ खां – यह मुगल बादशाह शाहआलम का मीरबक्शी था, हिंदी में कहें तो बड़ा मंत्री भी था और सेनापति भी। दूसरा सआदत अली खां – यह अवध के नवाब शुजाउद्दौला का बेटा था, इसका सौतेला भाई आसफ़ुद्दौला भी नवाब बना, बाद में इसका भी नवाब बनने का नम्बर लगा, रिश्तेदारी का कनेक्शन यह था कि यह नजफ़ खां का साला लगता था। तीसरा नाम है महाराजा रणजीत सिंह – ये महाराजा सूरजमल के सबसे छोटे बेटे थे, इस घटना के समय तक यह महाराज नहीं बने थे, भरतपुर की गद्दी पर स्वर्गीय महाराजा रतन सिंह के नाबालिग पुत्र केहरी सिंह विराजमान थे और रणजीत सिंह मुख्त्यार राज (प्रतिनिधि) के रूप में शासन संभाल रहे थे। चौथा नाम है ठाकुर किशन सिंह – ये कोठरीबन्द ठाकुर थे, इनका ठिकाना था पथैना।

घटना की पृष्ठभूमि

जिस समय की यह बात है वह समय भरतपुर राज्य के लिए बहुत कठिन समय था। मिर्जा नजफ़ खां डीग के किले तक को जीत चुका था। डीग से लेकर बयाना, हिंडौन आदि तमाम क्षेत्र नजफ़ खां के कब्जे में था। नजफ़ खां ने नवाब सआदत अली खां को बयाना, हिंडौन आदि परगनों की जागीर प्रदान की और उससे राजस्व वसूली के लिए कहा। 

सआदत अली खां का अभियान

18 फरवरी 1777 ईस्वी के दिन दो हजार घुड़सवार, एक हजार पैदल और हल्के तोपखाने के साथ नवाब ने आगरा से वैर की ओर कूच किया। नवाब की सेना में असद खां, ताज मुहम्मद खां और सैय्यद अहमद खां जैसे बड़े सेनापति भी थे। इनके रास्ते में पड़ने वाले तमाम जमींदारों ने इन्हें खिराज (टैक्स) देकर अपना पिंड छुड़ाया। यहां तक कि वैर के राजा बहादुर सिंह ने भी नवाब से समझौता कर लिया। अब बारी थी पथैना की। यहां के कोठरीबन्द ठाकुर किशन सिंह ने ठाकुर दलेल सिंह और देवी सिंह आदि के इस विषय पर बातचीत कर आगे की रणनीति पर विचार किया। अब किशन सिंह के वकील के रूप में ठाकुर पौहप सिंह नवाब के पास गए। नवाब ने चार हजार रुपये मांगे। पौहप सिंह ने रूपये देने से साफ मना कर दिया और कहा कि हमारे पास दो तुर्की घोड़े हैं अगर चाहो तो उन्हें ले लो पैसा एक भी नहीं मिलेगा।

बजने लगी युद्ध की दुंदुभी

पौहप सिंह ने जो प्रस्ताव नवाब के सामने रखा था उसका परिणाम युद्ध के रूप में सामने आना ही था। ठाकुर  किशनसिंह के नेतृत्व में उसके सभी भाई-बन्धु, बेटे, तीनों डूंगों के सरदार, मामा मायाराम (जावली वाले), धौंकल सिंह, पण्डित तोफाराम, सीसराम खुंटेल, झारोटी के मीणा आदि तैयार हो गए। किले के परकोटे पर 34 तोपें लगाकर मोर्चा जमाया गया। जाटों की सेना बरछा, दुधारी तलवार, बाण, बन्दूक, सेला, सांग और रामचंगी आदि आयुधों से सज्जित थी। नवाब की सेना ने बाणगंगा नदी को पार करके पथैना से दो किमी पहले उत्तर-पूर्व दिशा में भैसेना गांव में पड़ाव डाल रखा था। 

नवाब का पहला हमला नाकाम

नवाब सआदत अली ने सैय्यद अहमद खां के नेतृत्व में एक टुकड़ी को पथैना की गढ़ी पर आक्रमण करने भेजा। गढ़ी के दक्षिणी फाटक पर यह हमला हुआ। पर गढ़ी के रक्षकों ने तीर और बंदूकों से जबरदस्त प्रहार किया और नाकाम होकर सैय्यद को वापस भागना पड़ा। इधर ठाकुर किशनसिंह का पुत्र कुंवर मानसिंह कुम्हेर में रणजीत सिंह के पास था। अपनी गढ़ी पर आक्रमण की खबर मिलते ही वह कुम्हेर से पथैना की ओर चल दिया। रणजीत सिंह ने उसकी मदद के लिए दो सौ पैदल बन्दूकची उसके साथ रवाना किये। युद्ध की दूसरी रात ये लोग पथैना की गढ़ी में प्रवेश कर गए। 

नवाब का सन्धि प्रस्ताव

अब तक की असफ़लता के कारण नवाब लड़ाई के स्थान पर मामले को बातचीत से हल करने का इच्छुक हो गया। वैसे भी उसे नजफ़ खां के साफ निर्देश मिले हुए थे कि वह जाट जागीरदारों के साथ इज्जत से पेश आये। नवाब ने हलैना के सवाईराम को समझौते की बात करने के लिए पथैना की गढ़ी में भेजा। डूंग पंचायत ने समझौता न करने का निर्णय लिया। उधर कुम्हेर से रणजीत सिंह ने ठाकुर पौहप सिंह को करौली रवाना किया ताकि वह वहां मौजूद मराठा सरदार राघौजी पण्डित से सहायता प्राप्त कर सके।

गढ़ी की दीवार में लगी सेंध

नौ मार्च को नवाब की सेना ने फिर से गढ़ी को तोड़ने की कोशिश की। गढ़ी की दीवार में सुरंग बनाकर बारूद भरी गई। आग लगा कर विस्फोट किया गया। दीवार ढह भी गयी पर यह दीवार धूंधस में होने के के कारण ज्यादा नुकसान नहीं हुआ। इस समय भयंकर टकराव हुआ। इस हमले में 60 पथैना वीर काम आए। उधर ठाकुर पौहप सिंह करौली पहुंच कर मराठों की सहायता लेने में सफल हो गया। एक रुपया प्रति घुड़सवार प्रतिदिन के हिसाब से मराठा सेना का रेट तय हुआ। पौहप सिंह पांच सौ मराठा सवारों को लेकर आया। मराठों की टुकड़ी ने पथैना के दक्षिण में चार किमी पहले बारछैन गांव में पड़ाव डाला। फिर अचानक पौ फटते ही हमला करने का निर्णय हुआ। 

नवाब की सेना में मची भगदड़

मराठा सेना ने दिन निकलने से पहले ही नवाब के पड़ाव पर धावा बोल दिया। मुगल सैनिक निश्चिंत सोए थे। अचानक हमला होने पर नवाब की सेना में भगदड़ मच गई। जब तक मुगल सैनिक हथियार संभालते तब तक मराठा और जाट सैनिक काल बनकर उनके सिर पर सवार हो गए। नवाब सआदत अली यह दृश्य देखकर घबरा गया। वह अपने चुनिंदा विश्वासपात्र सैनिकों के साथ मैदान छोड़कर भाग निकला। पीछे से उसकी सेना भी भागी। मराठों और जाटों ने उनका पीछा किया और भयंकर मारकाट की। बड़ी संख्या में मुगल सैनिक मारे गए। नवाब की सेना का डेरा-तम्बू, साज-समान और बाजार सब जाटों के हाथ लगा। नवाब सआदत अली तो इतनी दहशत में था कि उसने आगरा पहुंच कर की चैन की सांस ली।

यह छोटी सी लड़ाई बड़ी ताकत के सामने बड़े हौसले की जीत का प्रतीक है।

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