दो खामोश आंखें – 23 Posted on 2nd February 2011 by Yogendra Singh Chhonkar योगेन्द्र सिंह छोंकर मेरी ही बदकिस्मती थी जो न हो सका उनका मुझे अपना बनाना ही तो चाहती थी दो खामोश ऑंखें
साहित्य दो खामोश आंखें – 16 Yogendra Singh Chhonkar 2nd February 2011 0 योगेन्द्र सिंह छोंकर सामने रहकर न हुआ कभी जिस प्यास का अहसास उसे बुझाने दुबारा कभी मेरे पहलु में आएँगी दो खामोश ऑंखें
साहित्य दानलीला का निहितार्थ:-ब्रज सम्पत्ति का संरक्षण और रस संवर्धन Yogendra Singh Chhonkar 26th September 2023 0 यामिनी कौशिक श्री कृष्ण लीला में जो रस संचरण हुआ है वह दान लीला के कारण हुआ है। प्राय: जैसा कि कहा जाता है कि […]
साहित्य दो खामोश आंखें पीठ में सुराख किये जाती हैं Yogendra Singh Chhonkar 4th March 2011 1 योगेन्द्र सिंह छोंकर दो खामोश ऑंखें मेरी पीठ में सुराख़ किए जाती हैं! माना इश्क है खुदा क्यों मुझ काफ़िर को पाक किए जाती हैं! भागता हूँ […]