वीरवर गोकुला

वीर गोकुला

आगरा में हुआ था बलिदान


आज ही के दिन 1760 ईस्वी को यानी एक जनवरी को आगरा के किले के बाहर एक किसान क्रांतिकारी योद्धा को मुग़ल बादशाह औरंगजेब के सामने हथकड़ियों में जकड़ कर लाया गया। इस किसान नेता के साथ एक वृद्ध भी था जो उसका दादा ( पिता का चाचा) था। दोनों ने मुग़लिया सल्तनत को हथियारमन्द चुनौती दी थी। सल्तनत के तय किसान कर देने के साफ इनकार किया था और मुग़ल ओहदेदारों की हत्याएं भी की थीं। अपराध इतना ही नहीं था उन्होंने शाही इलाकों में लूटपाट भी की थी। अपराध जाहिरा तौर पर अक्षम्य था। फिर भी उस समय प्रचलित एक अन्य सजा का विकल्प भी था। यह विकल्प था धर्म बदल कर इस्लाम स्वीकार करने का। इन दोनों ने धर्म बदलने से इनकार कर दिया और दोनों को मौत के घाट उतार दिया गया। इस क्रांति के नायकों का लहू जाया नहीं गया और इनके बलिदान ने आगे आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा दी। यही प्रेरणा आगे चलकर भरतपुर जैसे सुदृढ़ राज्य का स्वरूप ले पाई।एक जनवरी 1760 को आगरा के लाल किले के सामने जिस किसान नेता को शरीर का एक-एक अंग काट कर मौत के घाट उतारा गया था वह था वीरवर गोकुला। और उसके साथ जो वृद्ध था उसका नाम था उदयसिंह जिसे बोलचाल की भाषा में लोग सिंघा कहकर पुकारते थे। गोकुला का असली नाम भी गोकुला नहीं था उसका नाम था ओला। वह ओला से गोकुला कैसे बना यह हम आगे पढ़कर जानेंगे।

गोकुला के पिता मदूसिंह



कहानी थोड़ा पीछे से शुरू होती है जब दिल्ली की गद्दी पर शाहजहां का राज्य था और मौजूदा भरतपुर जिले के एक महत्त्वपूर्ण गांव सिनसिनी का जमींदार मदूसिंह नामक एक उत्साही युवा था। मदूसिंह सिनसिनवार गोत्र का जाट था। इस मदूसिंह ने अपने बाहुबल सिनसिनी गांव के ठाकुर का पद प्राप्त किया और मुग़ल साम्राज्य के फौजदार करोड़ी सागरमल के विरोध कर क्षेत्र में खासी प्रतिष्ठा अर्जित कर ली। इस मदुसिंह को महाकवि सूदन ने ‘शाह का उरसाल’ यानी शाहजहां के हृदय का कांटा लिखा है।  उसने अपने चाचा सिंघा के नेतृत्व में एक किसान संगठन तैयार कर लिया। इन्होंने कांमा, पहाड़ी, कसबाखोह आदि परगनों के जाट, गुर्जर तथा अन्य नवयुवकों के साथ मिलकर आगरा तथा दिल्ली के बीच के मुग़ल नियंत्रण वाले गांवों तथा शाही मार्गों में काफिलों तथा व्यापारियों के माल को लूटना शुरु कर दिया। इससे शाही मार्ग बन्द हो गये।मदुसिंह के उपद्रव को दबाने के लिए शाहजहां ने 1 जुलाई 1650 ई० को मिर्जा राजा जयसिंह को नियुक्त किया। जयसिंह आमेर चार हजार सवार और छह हजार की पैदल सेना लेकर मदूसिंह के इलाके में पहुंचा। मदूसिंह ने करीब एक वर्ष तक संघर्ष किया। मदूसिंह की सेना में जाट, मेव, खानजादौं, गूजर आदि जातियों के किसान थे जिनमें से अधिकांश मारे गए या बन्दी बना लिए गए। किसान तथा परिवार खेत रहे या बन्दी बना लिए गए। इस संघर्ष में मदूसिंह कई मृत्यु के बाद सिंघा को उस इलाके को छोड़ने को बाध्य होना पड़ा। सिंघा मदूसिंह के परिवार को साथ लेकर यमुनापारी जाट परिवारों में जाकर रहने लगा।

गोकुला का उत्कर्ष

मदूसिंह के चार पुत्र थे सिंधुराज, ओला, झम्मन और समन। इनमें जो ओला है वही आगे चलकर इतिहास में गोकुला के नाम से प्रसिद्ध हुआ। ओला का जन्म सिनसिनी गांव में हुआ था। ओला अपने दादा सिंघा के साथ यमुनापारी जाटों में जा बसा था।ओला अपने पिता और दादा के समान वीर और विद्रोही था। उसने मुग़ल साम्राज्य के प्रति विद्रोह को मजबूत करने के लिए स्थानीय किसानों का सहयोग प्राप्त किया। उसके बढ़ते प्रभाव को देखते हुए उसे दिल्ली के पास तिलपत गांव की जमींदारी दी गई। गोकुल से तिलपत जाकर बसने के कारण वह गोकुला कहलाने लगा। गोकुला धर्मनिष्ठ, स्वाधीनता प्रेमी, सुयोग्य संगठक, सैन्यसंचालक, पराक्रमी, साहसी, उद्यमशील, निर्भीक तथा स्वाभिमानी सरदार था।उसने किसानों पर मुग़ल साम्राज्य के अत्याचारों और करों का विरोध किया उन्हीं दिनों छत्रपति शिवाजी के गुरु समर्थ गुरुरामदास ने उत्तर भारत में कई स्थानों पर मुग़ल साम्राज्य को उखाड़ फेंकने की भावना पैदा करने वाले भाषण किये। गोकुला गुरु रामदास के विचारों से प्रभावित हुआ तब तक अधिकांश किसान उसे अपना नेता मान चुके थे।

गोकुला का संघर्ष


सन् 1666 ई०, मई में गोकुला ने भगवा रंग का झण्डा उठाया, जिस पर लिखा था “शिव हर-हर महादेव” और अपने 5000 वीर योद्धाओं के साथ मथुरा पहुंचा। वहां उसने मुख्य हाकिम तथा अन्य कई शाही अधिकारियों को मौत के घाट उतार दिया। फिर वह उन मंदिरों में पहुंचा जहां पर गायों को काटा जाता था। उसने वहां 221 बूचड़ों तथा 250 मांस बेचने वालों को कत्ल कर डाला।गोकुला ने किसानों को शाही कर न देने की घोषणा कर दी और दिल्ली से आगरा के मध्य क्षेत्रों में लूट-पाट एवं छापामार युद्ध जारी रखे।औरंगजेब ने सितम्बर 14, 1668 ई० को अब्दुन्नवी खां को मथुरा का फौजदार पुनः नियुक्त किया। उसने प्रशासनिक दृष्टि से यमुना नदी के पार गोकुल के दक्षिण में अपने नाम से एक नवीन छावनी स्थापित की। सन् 1669 ई० के शुरु में खान के सैनिक दस्ते लगान वसूल करने में लग गये, लेकिन किसानों के विरोध के कारण खान को स्वयं विप्लव क्षेत्र में उतरना पड़ा। मथुरा परगने के किसानों का नेतृत्व गोकुला ने स्वयं सम्भाला। अप्रैल 1669 ई० में फौजदार खान ने आन्दोलनकारियों के प्रमुख गढ़ सुराहा (सहोर) नामक गांव का घेरा डाल दिया और उसे बरबाद कर दिया। परन्तु आक्रमण के समय मई 10, 1669 ई० को गोकुला संगठन के क्रान्तिकारियों ने उस अब्दुन्नवी खां फौजदार को गोली से उड़ा दिया। मुग़ल सैनिक मैदान छोड़कर भाग निकले। सुरहा गांव की विजय ने किसान क्रान्तिकारियों के उत्साह में वृद्धि की। क्रांतिकारियों  ने सादाबाद नगर तथा परगने में भीषण लूटमार की और चारों ओर अग्निकांड का ताण्डव मचा दिया। उन्होंने शाही खजाना भी लूट लिया जिसमें उन्हें अस्सी हजार रुपये नकद हाथ लगे। अब आगरा, मथुरा, सादाबाद, महावन आदि परगने क्रान्ति के केन्द्र बन गये। मुगल कर्मचारियों का आतंक उठ गया और हिन्दू नागरिकों ने गोकुला का मुक्त-हस्त होकर साथ दिया।गोकुला तथा उसके दादा सिंघा (उदयसिंह) ने हरयाणा प्रदेश के दूर-दूर के क्षेत्रों के युवकों को भरती किया। कुछ ही समय में इक्कीस हजार जाट और पन्द्रह हजार अन्य जातियों के युवक जैसे अहीर, गूजर, रवे, सैनी आदि गोकुला के झण्डे के नीचे आ गये। ये सब योद्धा बिना वेतन लिए ही लड़े। इनको बन्दूकें देकर सिपाही बनाया।औरंगजेब ने 13 मई, 1669 ई० को अपने एक सेनापति रादअंदाज़ को आगरा के सीमावर्ती क्रान्तिकारियों को दबाने के लिए भेजा और उसी दिन सुयोग्य प्रशासक सैफशिकनखां को मथुरा का फौजदार नियुक्त कर दिया। किन्तु इन सेनापतियों से वीर आन्दोलनकारी नहीं दब सके और क्रान्ति की काली छाया प्रति माह तेजी के साथ फैलती गई, जिससे मुगलिया सरकार तथा परगनों में गोकुला का भयंकर आतंक छा गया।औरंगजेब स्वयं एक विशाल मुग़ल सेना तथा तोपखाने के साथ रविवार, 28 नवम्बर के दिन दिल्ली से मथुरा पहुंचा और वहां छावनी डालकर गोकुला के विरुद्ध फौजी सेनापतियों का संचालन किया।शनिवार, 4 दिसम्बर, 1669 ई० के दिन हसन अली खां बड़ी सेना के साथ सादाबाद तथा मुरसान की गढ़ियों की ओर रवाना हुआ। उसी दिन उसकी सेनाओं ने रेवाडा, चंदरख और सरखरु नामक तीन गढियों पर एक साथ आक्रमण किया और इन्हें चारों ओर से घेर लिया। क्रान्तिकारियों ने दोपहर तक शत्रु का वीरता, साहस तथा बड़े उत्साह के साथ जमकर मुकाबिला किया। परन्तु वे मुगल सेना को पराजित न कर सके। अतः अनेकों अपनी पत्नियों को जौहर की ज्वाला में विदा करके अथवा तलवार के घाट उतारकर शेर की भांति मुगल सेना पर टूट पड़े और उसके घेरे को तोड़कर भागने में सफल हुए। दोनों ओर के अनेक सैनिक काम आये।

तिलपत युद्द का परिणाम


फौजदार हसन अली खां एक विशाल मुगल सेना तथा अन्य फौजदारों की नई कुमुक लेकर गोकुला का पीछा करने को आगे बढ़ा। इस विशाल सेना ने मथुरा, महावन तथा सादाबाद परगनों को बुरी तरह घेर लिया। इस भारी दबाव के कारण जाट सरदार गोकुला को सादाबाद परगना खाली करना पड़ा और उसने तिलपत में युद्ध की घोषणा कर दी।अतः हसन अली खां भी सादाबाद को छोड़कर तिलपत की ओर बढ़ा। इस अभियान में उसके साथ उसका पेशकार शेख राजउद्दीन भागलपुरी भी था। इसके अतिरिक्त हसन अली खां के नेतृत्व में दो हजार घुड़सवार, 25 तोपें, एक हजार तोपची, एक हजार धनुर्धारी, एक हजार राकेटधारी थे। गोकुला और उसके दादा सिंघा (उदयसिंह) के नेतृत्व में बीस हजार साहसी सैनिक थे। उन्होंने दिसम्बर, 1669 ई० में तिलपत से 20 मील दूर भयंकर जंगलों की आड़ लेकर मुगलिया सेनाओं पर आक्रमण कर दिया। इन्होंने कई दिन तक शाही सेना का कड़ा मुकाबला किया, किन्तु तोपों की मार ने इनके पैर उखाड़ दिये। अतः एक रात्रि में उन्होंने अपना घेरा उठा लिया और तिलपत गांव में युद्ध की तैयारियां शुरु कर दीं। शाही सेना ने तिलपत को घेर लिया और तोपों से गोलाबारी शुरु कर दी। किसानों के घर गोलों की मार से ध्वस्त होने लगे, किन्तु खण्डहरों में से शाही सेना पर जवाबी हमले होते रहे। शाही सैनिकों का साहस तीन दिन तक गांव में घुसने का नहीं हुआ। वे गांव में, उसी समय घुस सके, जब गांव का प्रत्येक पुरुष बलिदान कर चुका था। तिलपत गांव की समस्त विवाहित अथवा अविवाहित नारियों ने घरों में आग लगाकर अथवा कुओं में कूदकर अपने नारीत्व की रक्षा की। मुगल सेना ने तिलपत गढ़ी पर अधिकार कर लिया। इस युद्ध में मुगल सेनानायकों सहित चार सैनिक काम आये और कई हजार बुरी तरह जख्मी हुए, जबकि पांच हजार क्रांतिकारी खेत रहे। वीर गोकुला एवं उसके दादा सिंघा (उदयसिंह) को बन्दी बना लिया गया। इन दोनों को तिपलत से आगरा ले जाया गया।

गोकुला का बलिदान


शनिवार, जनवरी 1, 1670 ई० के दिन औरंगजेब ने मथुरा से अपनी छावनी उठाई और आगरा किले के महलों में प्रवेश किया। फौजदार हसन अली खां जाट सरदार गोकुला और उपनेता सिंघा (उदयसिंह) को सम्राट् के सामने ले गया। जहां धर्म परिवर्तन से इनकार करने पर गोकुला और सिंघा को निर्दयता पूर्वक मौत के घाट उतार दिया गया।

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