दो खामोश आंखें – 17 Posted on 2nd February 2011 by Yogendra Singh Chhonkar योगेन्द्र सिंह छोंकर करने को सुबह शाम क्यों देती हो होठों को थिरकन हो जाएगी दिन से रात जो एक बार पलक झुका लें दो खामोश ऑंखें
साहित्य दो खामोश आंखें – 27 Yogendra Singh Chhonkar 2nd February 2011 0 योगेन्द्र सिंह छोंकर अपने बच्चे का निवाला कोयल कुल के कंठ में डालने वाले कौए को सदा ही दुत्कारती हैं दो खामोश ऑंखें
साहित्य मजदूर के लिए 2 Yogendra Singh Chhonkar 5th March 2011 0 योगेन्द्र सिंह छोंकर ओ मेरी रहनुमाई के दावेदारों जरा सुनो मेरी आवाज़ नहीं चाहिए मुझे धरती का राज गर सो सके तो करा दो सुलभ […]
साहित्य दो खामोश आंखें – 23 Yogendra Singh Chhonkar 2nd February 2011 0 योगेन्द्र सिंह छोंकर मेरी ही बदकिस्मती थी जो न हो सका उनका मुझे अपना बनाना ही तो चाहती थी दो खामोश ऑंखें