दो खामोश आंखें – 1 Posted on 28th January 2011 by Yogendra Singh Chhonkar कैसे लिखूं मैं वो प्यारे पल जिनका साक्षी मैं और दो खामोश ऑंखें
साहित्य दो खामोश आंखें 7 Yogendra Singh Chhonkar 28th January 2011 0 योगेन्द्र सिंह छोंकर किसी के रूप से होकर अँधा जो मैं भटका जहाँ में जानता हूँ पीठ पर चुभती रहेंगी दो खामोश ऑंखें
साहित्य सपना – एक महिला के अंतहीन संघर्ष की गाथा Yogendra Singh Chhonkar 29th August 2023 0 कहानी पायल कटियार कभी कभी जिंदगी वह सब करने के लिए मजबूर कर देती है जिसे मनुष्य करना नहीं चाहता है। लेकिन कहते हैं मजबूरी […]
साहित्य दो खामोश आंखें पीठ में सुराख किये जाती हैं Yogendra Singh Chhonkar 4th March 2011 1 योगेन्द्र सिंह छोंकर दो खामोश ऑंखें मेरी पीठ में सुराख़ किए जाती हैं! माना इश्क है खुदा क्यों मुझ काफ़िर को पाक किए जाती हैं! भागता हूँ […]