दो खामोश आंखें – 20 Posted on 2nd February 2011 by Yogendra Singh Chhonkar योगेन्द्र सिंह छोंकर जी जाऊं पी विसमता विष रस समता बरसाऊँ रहे सदा से रोते जो उनको जाय हसाऊँ जो एक बार फिर से देख पाऊँ दो खामोश ऑंखें
साहित्य गुलदस्ता Yogendra Singh Chhonkar 21st June 2023 0 कहानी (पायल कटियार) आज मैडम ने आखिर गुलदस्ता क्यों मंगवाया है? आज तो कोई ओकेशन भी नहीं है। सभी के मन में यह विचार में […]
साहित्य दो खामोश आंखें – 30 Yogendra Singh Chhonkar 2nd February 2011 0 योगेन्द्र सिंह छोंकर ज़बर के जूतों तले मसली जाने के बाद ज़माने के साथ साथ खुद अपनी आँखों से भी गिर जाती हैं दो खामोश […]
साहित्य पाबू प्रकाश के काव्य का मूल्यांकन Yogendra Singh Chhonkar 11th November 2021 0 पाबू प्रकाश एक प्रबन्ध काव्य है जिसमें समसामयिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के साथ पाबू का सम्पूर्ण चरित्र वर्णित है। हम उसे एक महाकाव्य की […]