दो खामोश आंखें – 4 Posted on 28th January 2011 by Yogendra Singh Chhonkar योगेन्द्र सिंह छोंकर तेरी हैं या मेरी हैं या हैंं किसी और की किसकी हैं ये तो खुद भी नहीं जानती दो खामोश ऑंखें
साहित्य दो खामोश आंखें – 20 Yogendra Singh Chhonkar 2nd February 2011 0 योगेन्द्र सिंह छोंकर जी जाऊं पी विसमता विष रस समता बरसाऊँ रहे सदा से रोते जो उनको जाय हसाऊँ जो एक बार फिर से देख […]
साहित्य दो खामोश आंखें – 21 Yogendra Singh Chhonkar 2nd February 2011 0 योगेन्द्र सिंह छोंकर कभी भटकाती कभी राह दिखाती कभी छिप जाती कभी आकर सामने अपनी ओर बुलाती मुझसे है खेलती या मुझे खिलाती दो खामोश […]
साहित्य कभी आबाद घर यां थे Yogendra Singh Chhonkar 18th July 2020 0 जहां वीराना है, पहले कभी आबाद घर यां थे, शगाल अब हैं जहां बसते, कभी रहते बशर यां थे। जहां फिरते बगूले हैं, उड़ाते खाक […]