कथा बरसाना की विजय लाड़लीजी की

बरसाना के लाड़लीजी मन्दिर में दर्शन करने वाले भक्तों ने अक्सर विजय लाड़लीजी के बारे में सुना होगा। विजय लाड़लीजी को विजय की प्रतीक माना जाता है। बरसाना के लाड़लीजी मन्दिर में आने वाले भक्तों को कभी भी विजय लाड़लीजी के दर्शन नहीं कराए जाते हैं। इनके दर्शन सिर्फ मन्दिर के गर्भगृह में जाने के समय पर मन्दिर के सेवायत ही कर पाते हैं। हिस्ट्रीपण्डित डॉटकॉम पर विजय लाड़लीजी की सम्पूर्ण कथा प्रस्तुत की जा रही है। 

यहां से शुरू होती है कथा विजय लाड़लीजी की

लाड़लीजी की प्रतीकात्मक फोटो।



ब्रज के मंदिरों में से अधिकांश मंदिर ऐसे हैं जिनमें विराजमान देव-विग्रहों को मुग़लकाल में ब्रज से हटाकर राजपूत राजाओं के राज्यों में ले जाया गया था। मुग़लकाल में मंदिरों को नष्ट करने के लिए होने वाले आक्रमणों से बचने के लिए ऐसा किया जाता था। बरसाना में भी कुछ इसी तरह की घटना हुई। बरसाना का मंदिर सिकन्दर लोदी के कार्यकाल तक नहीं बना था ऐसे में उसके द्वारा मन्दिर तोड़ने के हमलों का यहां कोई अर्थ नहीं है। औरंगजेब के समय पर मन्दिर तोड़ने की घटनाएं कई जगहों पर हुईं पर बरसाना उनसे अछूता रहा। ईरान के शाह अहमद शाह दुर्रानी के हमलों का असर मथुरा-वृंदावन के मंदिरों पर पड़ा लेकिन बरसाना इनसे अछूता रहा। बरसाना की भौगोलिक स्थिति डीग के नजदीक है। उन दिनों डीग-भरतपुर पर महाबलशाली राजा सूरजमल का राज्य था। अहमदशाह सूरजमल से सीधे-सीधे भिड़ने में हिचक रहा था। इसी वजह से वह मथुरा, वृंदावन और गोकुल में नरसंहार कर लौट गया और बरसाना की ओर बढ़ने की हिम्मत नहीं कर पाया। लेकिन एक समय ऐसा भी आया जब संकट बरसाना पर आ ही गया। बरसाना पर मुग़ल सेना का आक्रमण हुआ और बरसाना का युद्ध हुआ।

बरसाना में हुआ युद्ध था वजह


यह बात है 1773 ईस्वी की। उस समय दिल्ली की गद्दी पर मुग़ल बादशाह शाह आलम का शासन था। भरतपुर राज्य के राजा सूरजमल और उनके पुत्र राजा जवाहर सिंह जैसे महान योद्धा मृत्यु को प्राप्त हो चुके थे। सूरजमल का पौत्र केहरी सिंह जो कुल एक वर्ष का शिशु था भरतपुर राज्य का राजा था। केहरी सिंह की ओर से राज्य का प्रबंध उसका चाचा नवल सिंह करता था। इस समय भरतपुर राज्य पहले जैसा ताकतवर नहीं रहा था।  आपसी फूट और झगड़ों ने राज्य को कमजोर कर दिया था। मुग़ल बादशाह शाह आलम ने भरतपुर और डीग पर हमला करने के लिए अपने सेनापति नजफ़ खान के नेतृत्व में सेना भेजी। 30 अक्टूबर 1773 को मुग़ल सेना और भरतपुर की सेना के बीच में बरसाना और सहार के बीच युद्ध हुआ। इस युद्ध में भरतपुर की सेना हार गई और पीछे हटने को विवश हुई। युद्ध देर शाम तक चला था। युद्ध में भरतपुर की सेना के हारने की खबर मिलते ही मन्दिर के सेवायतों ने मन्दिर की रक्षा पर विचार किया और राधा रानी के विग्रह को तत्काल बरसाना मन्दिर से हटाकर श्योपुर ले जाने का निर्णय किया। कुछ चुनिंदा गोस्वामी लोग राधा रानी के विग्रह को लेकर श्योपुर के लिए चल दिये। नजफ़ खान ने अगले दिन बरसाना में प्रवेश किया। उसने बरसाना में स्थित हवेलियों में जमकर लूटपाट की। लोग पहले ही गांव छोड़कर भाग गए। रूपराम कटारा, मोहनराम लवानियां और श्रीलालजी टांटिया ठाकुर की हवेली की छतों को तोड़कर उनमें छुपाए गए हीरे-जवाहरात लुटे गए। गांव के अन्य मकानों को आग के हवाले कर दिया गया।  यह लूटपाट इतनी भयावह थी कि यहां हुए अग्निकांड की लपटें सात दिन तक दिखती रहीं थीं। हालांकि इस दौरान मन्दिर पर किसी भी तरह के हमले का कोई विवरण नहीं मिलता है। सात दिन बाद नजफ़ खान बरसाना छोड़कर लौट गया।

बरसाना के मन्दिर में विराजमान हैं विजय लाड़लीजी


राधा रानी के विग्रह को आपातकाल के कारण गोस्वामियों ने श्योपुर पहुंचा दिया था। बरसाना के लाड़लीजी मन्दिर में राधा रानी की एक अन्य प्रतिमा को स्थापित कर उनका पूजन अर्चन शुरू किया गया। आपातकाल में मन्दिर में पूजे गए राधा रानी के उस स्वरूप को विजय लाडली का नाम दिया गया। कुछ महीनों बाद भरतपुर राज्य और मुग़ल बादशाह के मध्य समझौता हो गया। बरसाना में भी हालात सामान्य हो गए और राधा रानी की मूल प्रतिमा को श्योपुर से वापस लाकर बरसाना के मन्दिर में विराजित कर दिया गया। तब से विजय लाड़लीजी की प्रतिमा मन्दिर के गर्भगृह में ही विराजमान है परंतु इस प्रतिमा के दर्शन किसी को नहीं कराए जाते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि राधाष्टमी के दिन जन्म के अभिषेक के दौरान विजय लाड़लीजी की प्रतिमा का अभिषेक और दर्शन कराए जाते हैं। ऐसा सही नहीं है बरसाना मन्दिर के सेवायत जगदीश गोस्वामी बताते हैं कि अभिषेक राधा रानी की मूल प्रतिमा का ही कराया जाता है। विजय लाड़लीजी के दर्शन कभी भी किसी को नहीं कराए जाते।

श्योपुर के किले में हुई राधा रानी की सेवा पूजा

श्योपुर के किले में स्थित राधा-कुंज। यह वही मन्दिर है जिसमें राधा रानी बरसाना से जाकर विराजित हुईं थीं।


बरसाना से श्योपुर पहुंचने के बाद गोस्वामियों ने वहां के धर्मपरायण राजा किशोरदास को सारी घटना से अवगत कराया। किशोरदास राधा रानी के अनन्य भक्त थे उन्होंने इस घटना को अपना परम सौभाग्य माना। राधा रानी की सेवा-पूजा की व्यवस्था किले के अंदर ही एक मन्दिर में कई गई। इस स्थान को आज भी राधा-कुंज के नाम से जाना जाता है। इस राधा-कुंज में आज भी राधा रानी का विग्रह विराजित है। स्थानीय लोगों का विश्वास है यह वही विग्रह है जो ब्रज से वहां ले जाया गया यह। हालांकि सच यह है कि श्योपुर के राधा-कुंज में करीब नौ-दस महीने विराजने के बाद राधा रानी को पुजारी जी बरसाना वापस ले आये थे। हो सकता है कि उसके बाद श्योपुर किले में स्थित राधा कुंज में राधा रानी की दूसरी प्रतिमा स्थापित कर सेवा-पूजा शुरू की गई हो, जो आज तक जारी है। 

कौन थे राजा किशोरदास

श्योपुर के किले में स्थित राजा किशोरदास की समाधि दायीं ओर उनके पूर्वज इंदरसिंह की समाधि बायीं ओर।


राजा किशोरदास श्योपुर राज्य के राजा थे और गौड़ वंश के राजपूत थे। श्योपुर निवासी इतिहासकार कैलाश पाराशर बताते हैं कि किशोरदास के पूर्वज 15वीं शताब्दी से ही श्योपुर के राजा रहे थे। इंद्रसिंह गौड़ इनके पूर्वजों में एक महान शासक हुए थे। किशोरदास शुरू से ही लाड़लीजी के अनन्य भक्त थे। राजा बनने से पहले से ही वे बरसाना आया करते थे। उन्होंने बरसाना में एक कुंज का भी निर्माण कराया था। यह कभी रासलीला के लिए काम आने वाली वह सघन-सुंदर कुंज अब घनी आबादी के बीच अपने पुराने स्वरूप को खोकर अतिक्रमण का शिकार हो गई है। जिससे इस कुंज का सिर्फ नाम ही बचा है। किशोरदास की राधा रानी के प्रति भक्ति इतनी थी कि उसने अपने पुत्र का नाम भी राधा रानी के नाम पर ही राधिकादास रखा। राधिकादास भी राधा रानी के बड़े भक्त थे। वे राज्य व्यवस्था पर बहुत कम ध्यान देते थे और अधिकांश समय राधा रानी की भक्ति में बिताते थे। मन्दिर में भजन के दौरान राधिकादास उठकर नाचने लगते थे। उनकी राज्य व्यवस्था के प्रति उदासीनता का फायदा उठाकर ग्वालियर के शासक दौलत राव सिंधिया ने श्योपुर पर आक्रमण कर उसे अपने अधिकार में कर लिया। बाद में उनके निवेदन पर उन्हें बडौदा सहित 23 ग्रामों का जागीरदार बना दिया बाद में उनकी प्रार्थना पर 9 ग्राम और दे दिये यह क्षेत्र आज भी बत्तीसा कहलाता है।

श्योपुर का राधा कुंज और राधा रानी की सेवा पूजा

श्योपुर के किले में स्थित राधा कुंज में वर्तमान में विराजित श्री राधा कृष्ण के दर्शन।


भले ही राधा रानी बरसाना मन्दिर के बजाय सैकड़ों कोस दूर श्योपुर के किले में बने मन्दिर में विराज रहीं थीं पर उनकी सेवा का दायित्व अभी भी बरसाना के गोस्वामीजन ही संभालते थे। जिस गोस्वामी की सेवा का अवसर आता तो वह श्योपुर पहुंच जाता। निर्धारित अवधि की अपनी सेवा करने के वह लौट आता था। बरसाना की स्थिति सामान्य होने के बाद गोस्वामियों ने राधा रानी की प्रतिमा को वापस लाने का मन बनाया। गोस्वामियों ने इस बारे में जब राजा किशोरदास से बात की तो उसने राधा रानी को बरसाना वापस भेजने से इनकार कर दिया।

राधा रानी की बरसाना वापसी

इसी दौरान सावन के महीने में एक वृद्ध गोस्वामी की सेवा का क्रम आया तो वह श्योपुर पहुंचा। राजा का नियम था कि रात को शयन आरती के बाद राधा-कुंज की चाबी राजा के महल में पहुंचा दी जाए। और सुबह मन्दिर खोलने के लिए गोस्वामी महल से चाबी लेकर खोलता था। राजा की इस सख्ती के बीच वह वृद्ध गोस्वामी राधा रानी के प्रेरणा से उनकी प्रतिमा लेकर रातों रात बरसाना के लिये निकल पड़ा। कहते हैं कि राजा के सैनिकों ने गोस्वामी का पीछा भी किया लेकिन वह उसे पकड़ नहीं पाए। ईश्वरीय कृपा से चम्बल और सीप जैसी नदियों की दुर्गम घाटियों को पार कर बरसाना पहुंच गया। जिस दिन वह गोस्वामी राधा रानी को लेकर बरसाना पहुंचा, वह हरियाली तीज का दिन था। समूचे बरसाना नगर में हर्ष की लहत दौड़ गई। मन्दिर में विविध प्रकार के आयोजन किये गए।

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